बाजार

-> पूर्ण प्रतियोगी बाजार: पूर्ण प्रतियोगी बाजार को समझने से पूर्व हम बाजार को हम पहले समझ लेते है। बाजार को लेकर अर्थ शास्त्रियों में विभिन्न मत पाए जाते है बाजार को दो वर्गो में बांटा गया है –

1. क्षेत्र के आधार पर: इसके चार रूप होते है

a) स्थानीय बाजार
b) प्रावेशिक या क्षेत्रीय बाजार
c) राष्ट्रीय बाजार
d) अन्तराष्ट्रीय बाजार

2. समय के आधार पर: इस प्रकार का वर्गीकरण मार्षल द्वारा किया गया।

a) अति अल्प कालीन बाजार
b) अल्प कालीन बाजार (1 महीने से 1 साल तक)
c)दीर्घ कालीन बाजार (6 वर्ष – 15 वर्ष तक)
d) अति दीर्घ कालीन बाजार

पूर्ण प्रतियोगी बाजार की विषेषताए –

1)  के्रताओं व विके्रताओं की अधिक संख्या पाई जाती है।
2). वस्तुओं की एकरूपता अर्थात वह सभी वस्तुएॅ रामरूप है इसलिए परस्पर पूर्ण स्थानापन्न।
3) के्रता और विके्रता को बाजार संबंधी संबंधी पूर्ण ज्ञान है। उद्योग में फर्मो का प्रवेष तथा निकासी स्वतंत्र रूप से पाया जाता है इसलिए दीर्घ काल में फर्म सामान्य लाभ  अर्जित करेंगी।
4) उत्पादन के साधनों में पूर्ण गतिषीलता पाई जाती है अर्थात् एक रोजगार में दूसरे रोजगार में जाने की स्वतंत्रता।
5) वस्तुओं की परिवहन व विक्रय लागत का अभाव पाया जाता है।
6) सरकार द्वारा इस पर कोई करारोपण या प्रतिबंध नही लगाया जाता।
7) फर्मे मूल्य स्वीकारक होती है और मूल्य का निर्धारण उद्योग द्वारा किया जाता है। फर्मो का समूह ही उद्योग कहलाता है।

औसत आय सीमान्त आय –

(AR)

(MR)

 

Q

P

TR=Q x P

AR =

MR=TRn-TRn-1

1

10

10

10

10

2

10

10

10

10

3

10

10

10

10

4

10

10

10

10

औसत लगान, सीमान्त लागत                  

Q

C

Q x C=TC

AC

TCn-Ten-1

MC

1

20

20

20

20

2

15

30

15

10

3

12

36

12

36

4

10

40

10

4

5

12

60

12

20

6

15

90

15

30

7

20

140

20

50

अल्प काल (0-1 वर्ष): इस अवधि में समय इतना कम रहता है कि उत्पादन में वृद्धि परिवर्तन शील साधनों (श्रम, कच्चा) में वृद्धि के माध्यम से होती है जबकि स्थित साधन (भवन, मषीन) में परिवर्तन नही होता।
दीर्ध काल (5 से अधिक 15 से कम): इस काल में समय इतना अधिक होता है कि परिवर्तनषील साधनों के साथ-साथ स्थिर साधनों में भी परिवर्तन के माध्यम से उत्पादन को समायोजित किया जा सकता है दोनों साधन परिवर्तनषील होते है।
दीर्ध काल में संतुलन: फर्मो का समूह ही उद्योग होता है उद्योग द्वारा निर्धारित मूल्य पर फर्म दीर्घ काल में दीर्घ कालीन औसत लागत वक्र के न्यूनतम हिन्दु पर उत्पादन करेगी जहा पर उन्हें सामान्य लाभ अर्जित होगा।
अल्पकाल में फर्म सामान्य लाभ |
हानि |
असामान्य लाभ 
तीनों स्थितियों में हो सकती है लेकिन दीर्ध काल में फर्म सिर्फ सामान्य लाभ ही अर्जित करेगी।

एकाधिकार:- एकाधिकार का शाब्दिक अर्थ अकंला विक्रेता है अर्थात पूर्ति पर किसी एक विक्रेता का अधिकार या नियंतत्रक यह पूर्ण प्रतियोगिता की पूर्णतः विपरीत स्थिति है। इसके उत्पादक या विक्रेता ऐसी वस्तु उत्पादित करता है। जिसका कोई नजदीकी स्थानापन्न न हो। एकाधिकारी वस्तु की पूर्ति को नियत्रिंत करके मूल्य को घटा-बडा सकता है। ऐसे में वह विभिन्न बाजारों में मूल्य विभेद भी कर सकता है। ऐसे में वह विभिन्न बाजारों में मूलय विभेद भी कर सकता है। मूल्य विभेद के लिए आवष्यक है कि विभिन्न बाजारों में मांग की लोच अलग-अलग हो या बाजारों के बीच इतनी पर्याप्त दूरी हो सके क्रेता सस्ते बाजार से सामान खरीद कर महंगे बाजार में बेचने में असफल हो। एकाधिकार में औसत आय तथा सीमान्त आय वक्र दोनों उपर से नीचे दाहिनी तरफ गिरते हुये होते है। एकाधिकार में संतुलन के लिए दो विधियाॅ प्रचलित है।

कुल आय:- कुल लागत – त्ज्ब् एकाधिकारें का लाभ उस बिन्दु पर अधिकतम होगा जहा पर कुल आय और कुल लागत का अंतर ज्यादा हो।

अल्प अधिकार काल में एकाधिकार की संस्थिति: अल्प काल में एकाधिकारों में मांग के अुनसार पूति में समायोजन केवल परिवर्तनषीलता साधनों (श्रम व कच्चा गाल) में परिवर्तन के द्वारा ही कर सकती है। ऐसे में उसे सामान्य लाभ असामान्य लाभ तथा हानि की स्थिति हो सकती है।

सामान्य लाभ: जम फर्म की औसत आय, औसत लागत के बराबर हो तब उसे सामान्य लाभ की प्राप्ति होगी अर्थात उसकी प्रति इकाई आय प्रति इकाई लागत के बराबर हो।

असामान्य लाभ: जब फर्म को प्राप्त होने वाली प्रति इकाई औसत आय, प्रति इकाई लागत, से अधिक हो तब उसे असामान्य लाभ की प्राप्ति होगी।

हानि की स्थिति (AR<AC) :-  फर्म को प्राप्त होने वाली लागत (AC) से कम हो तब उसे हानि की स्थिति प्राप्त होगी हानि की स्थिति में यदि एकाधिकारी को औसत परिवर्तनशील लागत (AVC) से कम मूल्य प्राप्त होगा तो एकाधिकारी उद्योग छोडकर बाजार चली जाएगी।

एकाधिकार में मूल्य निर्धारण तथा मांग की लोच: एकाधिकारी को दीर्ध काल में सदैव असामान्य लाभ प्राप्त होता है वह अपनी वस्तु का मूल्य मांग वक्र के उस भाग में निर्धारित करता है जहाॅ पर मांग की लोच इकाई से अधिक होगी।

प्रतियोगिता तथा फर्मो की संख्या के आधार पर बाजार का वर्गीकरण: 1926 से पूर्व पूर्ण प्रतियोगिता तथा एकाधिकार के अलावा बाजार की अन्य दषाओं की ओर किसी का ध्यान नहीं गया। 1926 में पियरों Sarifa ने अपने आर्थिक लेख में उपरोक्त दोनो बाजारों की अलोचना करते हुए कहा कि व्यवहारिक जतीवन में पूर्ण प्रतियोगिता व एकाधिकार के स्थान पर अपूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति पायी जाती है इस समस्या का उचित समाधान 1933 में प्रोफेसर चेम्बर लीक की Theory of Monogulistic Compotation  तथा श्रीमती जाॅन राॅबिन्सन की पुस्तक Economics of Impersect compition  के माध्यम से हुआ।

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